Posts

Traditional Chaudhary JATS dress of Western Uttar Pradesh.

Image
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पारंपरिक जाट पोशाक II पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट की हमेशा से अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतित पहचान रही हैं, जिनकी झलक हमे जाट के कुर्ते, सफेद लंबी टोपी जाट(khadi boli) भाषा से साफ़ झलकती हैं, पर बड़े दुख की बात ऐसी सांस्कृतिक पहचान को हम खोते जा रहे हैं जिसको दोबारा से मजबूती के साथ बचाने की ज़रूरत है अन्यथा वो दिन दूर नही जब हमारी कोई सांस्कृतिक पहचान नही होगी ओर हम सिर्फ़ भीड़ मे रल कर रह जाएँग े । क्योंकि किसी बिरादरी की पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत से की जाती है क़ि फलां व्यक्ति उस क्षेत्र का व इस बिरादरी का है पर जब संस्कृति ही नही बचेंगी तो बिरादरी का मान सम्मान व उसका इतिहास कहा बच पाएँगा इसलिए अपनी संस्कृती व अपने इतिहास को पहचानें। क्योंकि एक बात बिलकुल सत्य कहीं गयी हैं, अगर किसी जाति को जड़ से मिटाना हैं,तो उस जाति की संस्कृती एवं इतिहास को नष्ट कर दीजिए। वह जाति स्वतः ही नष्ट हो जाएगी।

दबंग जाट

पूरी दुनिया के  जाट  एक हैं पर हवा पानी का फर्क हैं जितने दबंग जाट  मुजफ्फरनगर ,   शामली ,  बागपत  बैल्ट के हैं ऐसे पूरे भारत मे कही के नहीं हैं जिस तरह हरियाणा मे खुलेआम  Meeting  हो जाती हैं जाट के खिलाफ , ये क्षेत्र भी जाट बहुल हैं सबको सीधा कर देते, यहाँ का जाट Criminal mind का होता हैं खाप मजबूत हैं एकता है मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत औऱ पश्चिमी मेरठ .. औऱ जाट   असभ्य  हैं तब तक ही इज्जत है कि कब मुह पर मार दे सभ्यता जाटो को  कमजोर  बना देती हैं

जाटलैंड :- जिला बिजनौर, पश्चमी यूपी

आज बताते हैं जिला बिजनौर के बारे में, उत्तराखंड की तलहटी में बसा जिला बिजनौर गंगा नदी से सुसज्जित है बिजनौर को उत्तराखंड का  प्रवेश द्वार भी कहा जाता है इस जिले में 22% जाट आबादी है जो कि जातिगत आधार पर सबसे बड़ी आबादी है, यहाँ की 50% से अधिक खेती की ज़मीन जाटो के पास है और जाट आर्थिक रूप से काफी सम्रद्ध भी हैं, 22% हिन्दू जाटो के साथ साथ जिले में अच्छी आबादी सिख जाटो की भी है जो अफजलगढ़, गंगा बैराज, चाँदपुर और नजीबाबाद क्षेत्र के ज़मीदार हैं..!! बिजनौर मे मुख्य खाप  तोमर  और  अहलावत  है बिजनौर मे तोमर गोत्र के 70-75 गांव हैं और अहलावत गोत्र के 65-70 गांव है बिजनौर के पूर्व विधायक सुखवीर सिहं अहलावत(रालोद) रह चुके हैं जिले में बड़े गोत्र तोमर, अहलावत, राठी, मलिक, राणा हैं और जाट एकता भी काफी प्रसिद्ध है...! इस जिले में चाँदपुर विधासभा को मिनी छपरौली भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ से बड़े चौधरी साहब ने जिसको भी उम्मीदवार बनाया जाटो ने उसे ही जिताया है, जाटो की राजनीतिक पकड़ जिले में बहुत मजबूत है जो चुनाव को एकतरफा करने का मद्दा रखती है..! बिजनौर जिले स...

अहलावत खाप

Uttar Pradesh has also opened a front against female feticide Ahlawat Khap - one of the biggest treasures in Uttar Pradesh, They have 242 villages and reside in 355 villages  Bijnor - 110 villages Muzaffarnagar - 23 villages Buland city - 19 villages Meerut - 17 villages Moradabad - 16 villages Bareilly - 11 villages Rampur - 8 villages, Bagpat - 2 villages Sambhal, Amroha, Ghaziabad are villages of Ahlawat Gotra in almost every district Bhainsi village headquarters of Muzaffarnagar is situated in the village of Ahulawatu, situated in Raipur Nangli village, 1 km away from Bhainsi. Raipur,  Nangali was the village of Muzaffarnagar, the oldest village in Bhuji , which had been killed by Bhatsi 's Jato, and afterwards the punishment of black water took place, but Jatto arrived in this village and Ahlawat 's turban was kept here.                

दबंग जाट

पूरी दुनिया के  # _जाट  एक हैं पर हवा पानी का फर्क हैं जितने दबंग जाट  # _मुजफ्फरनगर , # _शामली ,  # _बागपत  बैल्ट के हैं ऐसे पूरे भारत मे कही के नहीं हैं जिस तरह हरियाणा मे खुलेआम  # _Meeting  हो जाती हैं जाट के खिलाफ , ये क्षेत्र भी जाट बहुल हैं सबको सीधा कर देते, यहाँ का जाट Criminal mind का होता हैं खाप मजबूत हैं एकता है मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत औऱ पश्चिमी मेरठ .. औऱ जाट # _असभ्य  हैं तब तक ही इज्जत है कि कब मुह पर मार दे सभ्यता जाटो को  # _कमजोर  बना देती हैं

जय जाट जाट बलवान

Image
शायद ये बात बहुत कम लोगों को पता हों भरतपुर नरेश भरत सिरोमणि हिन्दू धर्मरक्षक अजय यौद्धा हिन्द केशरी महाराजा सूरजमल यूद्ध मैं दोनो हाथों से तलवार और धनुष चलाने की कला जानते थे ये कला सूरजमल के अलावा सिर्फ पांडू पुत्र अर्जुन जानते थे इसलिए सूरजमल को अर्जून ही के सातवें नाम विजय के नाम से भी जाना जाता था दोस्तो मोती डूँगरी की लड़ाई मैं सूरजमल ने सात राज्यों की सयुक्त सेनाओं को अपने पराक्रम से परास्त क्या था  राजपूत रानियां अपने महल के झरोखे से उस जाट महाराजा सूरजमल के पराक्रम की प्रसंसा कीये बिना नही रह पाए उनके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा .............. नही सही जाटणी ने व्यर्थ प्रसव की पीर जन्मा अपने ग्रभ से सूरजमल सा वीर।।।।। दोस्तो उस युद्ध को जीतने के बाद सूरजमल का डंका पूरे भारत वर्ष मैं बजने लगा । ओर हा दोस्तो हमारे हितिहास को किताबों के पन्नों से इस तरह गायब कर दिया कभी हमने इस बात पर ध्यान ही नही दिया अभी भी टाइम ह दोस्तो इस पोस्ट को इतना शेयर करो कि हर जाट के दिल मे अपना वही सोया हुवा स्वाभिमान जाग ऊठे ओर अपनी आने वाले पुस्ते इस बात पर गर्व कर सके कि हमने...

बावली गाँव एशिया के सबसे बड़े गाँव

बावली गाँव एशिया के सबसे बड़े गाँव में से एक गाँव है । जो की दिल्ली - सहारनपुर Sh 57 पर है । बावली गाँव को तीन भाईयों ने बसाया था । जिनका नाम बाहुबली सिंह, महावतसिंह, रूस्तमसिंह था ने क्रमश बाहुबली गाँव,महावातपुर, रुस्तमपुर बसाया । बाहुबली गाँव ही आज का बावली गाँव है । बावली गाँव में संवत 1560 के आस -पास सर्व खाप पंचायत भी हुई थी बावली में 7 पट्टी है । मुख्य पट्टी 1 देशो की 2 मोल्लो की 3 गोपी की 4 राणो की 5 कट्कड़ की मुख्य पट्टी है बावली गाँव में ही समय में तीन प्रधान होते है ।  राणो की पट्टी में तोमर गोत्र के जाट है । राणा टाइटल लिखते है । सन ११९७ ई. में राजा भीम देव की अध्यक्षता में बावली बडौत के बीच विशाल बणी में सर्वखाप पंचायत की बैठक हुई थी जिसमें बादशाह द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाने तथा फसल न होने पर पशुओं को हांक ले जाने के फरमानों का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए ठोस कार्रवाई करने पर विचार किया गया. इस पंचायत में करीब १००००० लोगों ने भाग लिया. पंचायती फैसले के अनुसार सर्वखाप की मल्ल सेना ने शाही सेना को घेर कर हथियार छीन लिए और दिल्ली पर चढाई करने का एलान किया. बादशाह न...

किसान और कमेरे

सर छोटूराम किसान और कमेरे (वैसे तो मेघों और जाटों के संघर्ष का एक अध्याय भी है जो काफी पुराना है. लेकिन अब तक वह संघर्ष जमीन के मालिकों और कमेरों के बीच सहयोग और परस्पर निर्भरता मेँ बदल चुका है. जाति के तौर पर भले ही वे अलग-अलग हों लेकिन कृषि और संबद्ध कार्यों के कारण उनकी समस्याएँ आपस मेँ जुडी हैं. अच्छी फसल से या खराब फसल से वे समान रूप से प्रभावित होते हैं. सामाजिक उथल-पुथल को इन्होंने संयुक्त रूप से और अलग-अलग झेला है. पिछले दिनों फेसबुक पर राकेश सांगवान की वॉल पर उनका एक आलेख पढ़ने को मिला. इसमें सर छोटूराम के विचारोँ के आधार पर दलितों और जाटों के धर्म सहित कई साझा संकटों पर भी प्रकाश डाला गया है. अभी तक मेघनेट पर जो लिखा है वह मेघ sensibility की दृष्टि से लिखा गया है. प्रस्तुत आलेख जाट दृष्टिकोण पर पर्याप्त रूप से प्रकाश डालता है. राकेश सांगवान ने इसे मेघनेट पर प्रकाशित करने की अनुमति दी है इसके लिए उनका आभार.) "तुम अगर बिछड़े रहो तो चंद कतरे ही फकत अगर मिल जाओ तो बिफरा हुआ तूफान हो तुम" हमारे देश में जाति आधार पर जनगणना आखिरी बार 1931 में हुई थी. उस वक़्त भारत मे...

खाप V/S कोर्ट

1-खाप में लगभग 20 आदमियो से लेकर 200 आदमी तक सुनवाई के बाद फैसला देते है,     जिसे पहले गांव स्तर पर    फिर तपा स्तर पर     फिर खाप स्तर पर और    फिर सर्वखाप स्तर पर चुनोतियाँ दी जा सकती है,    बल्कि    कोर्ट में एक आदमी बैठता है, अगर उसका मूड खराब है तो गई भैंस पानी मे। 2- खाप सिस्टम में अपराधी को नही अपराध को खत्म करके भाईचारा स्थापित करने पर जोर दिया जाता है     बल्कि     कोर्ट में आपस मे फांसी उम्रकैद करवा के दुश्मनी पक्की करवाई जाती है। 3- खाप में अगर 200 आदमी आ रहे है तो उनकी कोई फीस नही होती जबकि खाना पीना भी नही होता,     बल्कि     कोर्ट में मुकदमो में खर्चो पर इंसान को किडनी तक बेचनी पड़ सकती है, यहां भूखे पेट भजन ना होयो, 4- खाप सिस्टम में अपराधी समाज की आंखों में शर्मशार हो जाता है,     बल्कि     उसे जेल भेज कर कोर्ट उसको पक्का उघाड़ा बना देती है, 5- चाऊमीन वाला बयान देने वाले कि इज़्ज़त उतार ली थी खाप ने, वो इंसान आज तक सामने नही आया, ...

21 सिख जाट vs 12000 अफगानी सैनिक, सन 1897(सारागढ़ी का युद्ध)

आपने ग्रीक सपार्टा और परसियन की लड़ाई के बारे मेँ सुना होगा। इनके ऊपर हॉलिवुड में 300 नामक फिल्म भी बनी है। भारतीय युद्ध इतहास में चार महान (खास तौर से) लड़ाई भारत माँ के बहादुर बेटो मातृभूमि की रक्षा में लड़ी हैं! लेकिन अगर आप सारागढ़ी के बारे मेँ पढोगे तो पता चलेगा की दुनिया की महानतम लड़ाई  भारतीय सेना की 36 सिख रेजिमेंट के 21 जबाज़ों ने 12 हज़ार अफगानी पश्तून लड़ाकों से लड़ी थी! बात 1897 की है। नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट मेँ 12 हजार अफगानोँ ने हमला कर दिया। वे गुलिस्तान और लोखार्ट के किलोँ पर कब्जा करना चाहते थे। इन किलोँ को महाराजा रणजीत सिँह ने बनवाया था। इन किलोँ के पास सारागढी मेँ एक सुरक्षा चौकी थी। जंहा पर 36 वीँ सिख रेजिमेँट के 21 जवान तैनात थे। ये सभी जवान माझा क्षेत्र के थे और सभी सिख थे। 36 वीँ सिख रेजिमेँट मेँ केवल साबत सूरत (जो केशधारी हों) सिख भर्ती किये जाते थे। ईशर सिँह के नेतृत्व मेँ तैनात इन 20 जवानोँ को पहले ही पता चल गया कि 12 हजार अफगानोँ से जिँदा बचना नामुमकिन है। फिर भी इन जवानोँ ने लड़ने का फैसला लिया। और 12 सितम्बर 1897 को सिखलैँड की धरती पर एक ऐसी लड़ाई हुय...